Vimarsh

अत्तानो अत्त दीपो भव

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rahuldwivedi


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वापसी

Posted On: 5 Oct, 2015  
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नारी

Posted On: 1 Oct, 2013  
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कोट

Posted On: 6 Sep, 2013  
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एक और संभावना…..

Posted On: 3 Nov, 2011  
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एक सवाल…

Posted On: 8 Sep, 2011  
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ग़ुम होता चेहरा ( एक आम आदमी का ..!)

Posted On: 5 Sep, 2011  
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Others मेट्रो लाइफ में

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मैं, बरगद और गाँव

Posted On: 19 Jun, 2011  
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हाँ मैंने देखा है…

Posted On: 30 Mar, 2011  
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एक अवांतर कथा

Posted On: 18 Mar, 2011  
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संजीदगी

Posted On: 14 Mar, 2011  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

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के द्वारा: rahuldwivedi rahuldwivedi

बूढ़ा बरगद वक्त की प्रतिध्वनि देता हुआ प्रतीत होता है. कविता एक चिंतन के मंथन की अभिब्यक्ति है कवि का "मै" आज का नायक है . कविता में आये अन्य प्रतिबिम्ब वक्त के सोपान हैं . कविता कहीं मुक्तिबोध की ,तो कहीं अज्ञेय की एक मधुर झलक दिखाती है! बूढ़े बरगद का उपमान मुक्तिबोध के उपमानो के सामान दिखता है वहीं कविता में आये अन्य उपमानो से अतीत के जिस बिम्ब का चित्र प्रस्तुत होता है, वह कहीं न कहीं ह्रदय के एक कोने में अज्ञेय के "असाध्य वीणा" का भी अहसास करा देता है ! दुर्भाग्य है हिंदी कविता का कि आज अच्छी कविता बड़े कवि ही लिख सकते हैं और आलोचना भी बड़े आलोचकों द्वारा ही की जाती है यही कविता की कसौटी है किन्तु यदि वाकई इस कविता को कसौटी पर ईमानदारी के साथ कसा जाय तो यह कहीं से भी आज की अच्छी कविताओं से कमतर नहीं दीखती है ! कविता का अंत वर्तमान नही है वह थोड़ा भविष्य भी है, जिससे अतीत के उन सुनहरे सोपानों को सजोने की एक आस कवि द्वारा पाठक के लिए छोड़ी जाती है ! कविता एक लम्बी कविता या कहें कि एक बड़ी कविता लगती है किन्तु पाठक का मन इसे और आगे पदने तक को कहता है पाठक के मन का यही अहसास कवि की उपलब्धि है. अस्तु कवि अपनी सर्जना के उत्कर्ष को प्राप्त करता हुआ दीखता है ...

के द्वारा:

अजीत जी, एक पीड़ा है जिसको कवि बाटना चाहता है , बदलाव तो हो ही चुका है और काव्य नायक "मैं" बहुत दिनों पर जब गाँव लौटता है तो सब कुछ बदला सा लगता है जिन्हें वह छोड़ गया था. बरगद एक बिम्ब है (मानवीकरण किया गया है उसे एक बुजुर्ग समझें ) . उसने सारे बदलाव को देखा है .उसकी आँखों के सामने एक पूरी पीढ़ी बदल गयी, एक मात्र वही है जो पुराने से नए के बीच एक पुल का काम कर रहा है , पर उसकी भी विवशता है, एक उम्र हो चली है , कब तक वही सिर्फ बदलाव का साक्षी रहेगा, बाकी तो पलायित होते जा रहें हैं , मुद्दतों बाद जब हम अपनी जमीं पर आते हैं तो वह देखना चाहते हैं जो छोड़ गए थे , गाँव की समस्या उनके लिए बेमानी है .. कुछ ऐसी ही बिखरी हुई बातें हैं तो विचार में बिखराव प्रतीत हो रहा होगा .. खैर ! एक सार्थक प्रतिक्रिया के लिए आभार..

के द्वारा: rahuldwivedi rahuldwivedi

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